त्यौहार

विश्वकर्मा ने बनाई थी भगवान जगन्नाथ की मूर्ति

जगन्नाथ की मूर्ति स्थापना ब्रह्मदेव ने की थी

Lord Jagannath Statue
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विश्वकर्मा ने बनाई थी भगवान जगन्नाथ की मूर्ति, जगन्नाथ की मूर्ति स्थापना ब्रह्मदेव ने की थी, भगवान हर युग में, हर जगह, हर पल विद्यमान हैं। कृष्ण की नगरी पुरी घूमते हुए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा के अपने मौसी के घर जाने की भव्य यात्रा के महत्व के बारे में सुनते हुए दो गांवों की बहुत चर्चा सुनी थी।

मानवमात्र के उद्धार के लिए ईश्वर ने कई बार धरती पर अवतार लिया और मनुष्य को कष्टों से मुक्ति दिलवाई। पृथ्वी पर देवी-देवताओं के अनेकों मंदिर है जहां पर वह मूर्ति के स्वरूप में विद्यमान है। पुरातनकालीन, प्रतिष्ठित और हिंदूओं के कई प्रतिष्ठित मंदिर धरती पर मौजूद है, जहां प्रभू भक्तों को दर्शन देने के लिए विराजमान है। ऐसा ही एक पुराणोक्त और धर्मशास्त्रों में उल्लेखित मंदिर जगन्नाथ मंदिर है, जो ओडिशा के पुरी शहर में स्थित है।

राजा इंद्रयुम्न श्री क्षेत्र गए थे तब उसने कहा कि हे प्रभु ! आप मुझे दर्शन दीजिये, यदि मैंने पूरी श्रद्धा से प्रजापालन किया हो और आपके प्रति मेरी सच्ची भक्ति हो तो आप मुझे अपने दर्शन दीजिये, नहीं तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगा। ऐसा कहने के बाद वह बेहोश हो गए। उसके बाद उनको सपना आया कि हे राजा तुम निराश न हो तुम्हे विशेष काम के लिए चुना गया है, अर्थात नीलमाधव श्रीकृष्ण की खोज करते रहो, देवतागण इस काम में तुम्हारी सहायता करते रहेंगे। तुम एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाना शुरू करो, समय आने पर नीलकंठ के दर्शन भी तुम्हे अवश्य होंगे। इसके बाद राजा को होश आया और इस बात के बारे में उसने राजसभा को बताया और मंदिर का शुभ निर्माण तुरंत कराने का आदेश दिया।

उस वक्त एक वृद्ध कलाकार ने कहा कि मूर्ति बनाने का काम मुझ पर छोड़ दो, लेकिन मुझे एकांत स्थान चाहिए, मैं इस कार्य में कोई अवरोध नहीं चाहता हूँ, मैं यह मूर्ति निर्माण एक बंद कमरे में करूँगा, मूर्ति बनने पर मैं स्वयं दरवाजा खोल दूंगा। उस कमरे के अंदर कोई भी व्यक्ति नहीं आना चाहिए। आप सभी बाहर संगीत बजा सकते हैं जिससे मेरे औजारों की आवाज़ बाहर तक ना आये। यह मूर्ति का कार्य २१ दिनों तक चलेगा, तब तक मैं ना कुछ खाऊंगा ना पिऊंगा। सभी लोग अपने कानों को दरवाज़ों पर लगा लेते थे और औजारों की आवाज़ सुना करते थे। अचानक १५ वें दिन आवाज़ आना बंद हो गयी। रानी गुंडिचा बेहद चिंतित हो गई कि कहीं अंदर कोई अनहोनी तो नहीं हो गई। उन्होंने धक्का देकर दरवाज़ा खोल दिया और वृद्ध को दिया हुआ वचन टूट गया। दरवाज़ा खुलते ही मूर्तिकार अदृश्य हो गया, मूर्ति अधूरी रह गयी।

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