त्यौहार

भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में है श्रीकृष्ण का रहस्य

भगवान जगन्नाथ योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्वरूप है

Lord Jagannath Mystery of Krishna
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भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में है श्रीकृष्ण का रहस्य, भगवान जगन्नाथ योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्वरूप है, जगन्नाथपुरी को धरती का बैकुंठ कहा जाता है। मंदिर में काष्ट की प्रतिमाएं स्थापित है और भगवान जगन्नाथ की मनोहारी प्रतिमा के अंदर एक अद्भुत अलौकिक रहस्य समाया हुआ है। पूरी के जगन्नाथ मंदिर में कई चीजें बड़ी ही आश्चर्य से भरी हैं। पहली तो यह कि यहां भगवान की प्रतिमा किसी पत्थर या धातु से नहीं बनी बल्कि पेड़ के तने ये बनी हैं और ये अधूरी भी है।

मान्यता है कि श्रीकृष्ण की मृत्यु उस वक्त हुई थी जब वह प्रभास क्षेत्र के भालका तीर्थ में एक पीपल के पेड़ के नीचे लेटे हुए थे, तभी जरा नाम के एक भील के द्वारा छोड़ा गया एक जहरीला तीर उनके पैर के तलवे में लगा और इसी को उन्होंने धरती पर अपना अंतिम समय मानकर उन्होंने देहत्याग कर दिया।

पांडवों को जब श्रीकृष्ण की देहत्याग का पता चला तो उन्होंने विधि-विधान के साथ उनके नश्वर शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया। सारा शरीर राख मे तब्दील हो गया, लेकिन ब्रह्मा कृष्ण के नश्वर शरीर में विराजमान थे इस कारण उनका दिल जलता ही रहा, तब ईश्वर के आदेशानुसार जलते हुए दिल को जल में प्रवाहित कर दिया गया और उस पिंड ने एक लट्ठे का रूप ले लिया।

अवंतिकापुरी के राजा इन्द्रद्युम्न, जो भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे, उनको यह लट्ठा मिला और उन्होंने इस दिल रुपी पिंड को भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के अंदर स्थापित कर दिया। प्राचीन समय में स्थापित किया गया श्रीकृष्ण का दिल आज भी भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में स्थापित है।

इस पिंड को आज तक किसी ने नहीं देखा है। नवकलेवर के अवसर पर जब १२ या १९ साल में मूर्तियों को बदला जाता है तब भी पुजारी की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है और हाथ पर कपड़ा ढक दिया जाता है। इसलिए वे ना तो उस लट्ठे को देख पाए हैं और ही छूकर महसूस कर पाए हैं। बस इतना अहसास होता है कि लट्ठा काफी नर्म होता है।

मंदिर में भगवान जगन्नाथ के साथ उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलराम भी स्थापित किए गए हैं। कथाएं बताती हैं कि सुभद्रा को अपने मायके से बहुत प्रेम था और वह यहीं रहना चाहती थीं इसलिए उन्हें भी वहां स्थान दिया गया तो आइए जानें की किन वजहों से उनकी प्रतिमा अधूरी रह गई। सुभद्रा और बलराम को तीन बार ममेरा (मामा पक्ष का उपहार) दिया जाएगा। अभी दो बार ही दिया जाता है।

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