धर्म

तिरुपति बालाजी में बाल छोड़कर क्यों आते हैं

भगवान बालाजी को वैंकेटेश्वर क्यों कहा जाता है?

Tirupati Balaji
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दिन में तीन बार कर सकते हैं भगवान बालाजी की प्रतिमा के दर्शन| दक्षिण भारत का तिरुपति बालाजी का मंदिर में जग प्रसिद्ध है। तिरुपति बालाजी का मंदिर आंध्र प्रदेश के चित्तुर जिले में आता है। मंदिर मेरूपर्वत के सप्त शिखरों पर बना हुआ है| ये मंदिर भारत के सबसे अमीर मंदिर है|

मंदिर में बालाजी के दिन में तीन बार दर्शन होते हैं। पहला दर्शन विश्वरूप कहलाता है, जो सुबह दिखाई देता है। दूसरे दर्शन दोपहर में और तीसरे दर्शन रात में होते हैं। बालाजी की पूरी मूर्ति के दर्शन केवल शुक्रवार को सुबह अभिषेक के समय ही किए जा सकते हैं।

तिरुपति बालाजी को भगवान विष्णु का ही रूप है। लोग सभी पाप और बुराइयां को छोड़ने का संकल्प लेते हैं, उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं। लोग यहां अपनी सभी बुराइयों और पापों के रूप में बाल छोड़ जाते है।

मेरूपर्वत को शेषांचल भी कहते हैं। सात चोटियां शेषनाग के सात फनों का प्रतीक हैं। इन चोटियों को शेषाद्रि, नीलाद्रि, गरुड़ाद्रि, अंजनाद्रि, वृषटाद्रि, नारायणाद्रि और वेंकटाद्रि कहा जाता है। इनमें से वेंकटाद्रि चोटी पर भगवान बालाजी विराजित हैं, इसी वजह से इन्हें वेंकटेश्वर कहा जाता है। मंदिर में स्थापित काली दिव्य मूर्ति किसी ने बनाई नहीं, बल्कि ये जमीन से प्रकट हुई थी। है।

विष्णु जी को तुलसी के पत्ते बहुत प्रिय हैं, इसलिए इनकी पूजा में तुलसी के पत्ते का महत्व है। तिरूपति बालाजी में भी रोज तुलसी पत्र चढ़ाया जाता है| पूजा के बाद तुलसी के पत्तों को मंदिर परिसर के कुंए में डाल दिया जाता है।

तिरुपति बालाजी की यात्रा के नियम के अनुसार बालाजी के दर्शन करने से पहले कपिल तीर्थ पर स्नान करके कपिलेश्वर के दर्शन करना चाहिए। फिर वेंकटाचल पर्वत पर जाकर बालाजी के दर्शन करना चाहिए और इसके बाद पद्मावती देवी के दर्शन करने की पंरापरा है।

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